हाजिरी के लिए पेड़ पर नहीं चढ़ सकता...': ऑनलाइन अटेंडेंस पर अड़े MP के शिक्षक, स्कूल में टावर लगाने की मांग
नेटवर्क समस्या, निजता का हनन और वेतन कटौती की धमकी के बीच 'हमारे शिक्षक' ऐप से जूझ रहे अध्यापक; हाईकोर्ट ने भी मांगा हलफनामा.
Tue, 25 Nov 2025
मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के लिए अनिवार्य की गई ऑनलाइन उपस्थिति (ई-अटेंडेंस) एक बड़े विवाद का कारण बन गई है। स्कूल शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों से शिक्षकों की अनुपस्थिति रोकने के लिए इस वर्ष से 'हमारे शिक्षक' ऐप के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराना अनिवार्य कर दिया है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों के शिक्षक इस नई व्यवस्था का पुरजोर विरोध कर रहे हैं और अपनी समस्याओं को लेकर विभाग के सामने अजीबोगरीब तर्क और मांगें रख रहे हैं।
'पेड़ पर चढ़कर हाजिरी लगाना असंभव': शिक्षक का अनोखा जवाब
शिक्षा विभाग ने जिन शिक्षकों को ऑनलाइन हाजिरी न लगाने पर नोटिस जारी किए हैं, उनके जवाब अब सामने आने लगे हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं। अशोकनगर जिले के एक शिक्षक ने नोटिस के जवाब में स्पष्ट लिखा है कि वह स्कूल की छत या पेड़ पर चढ़कर ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करने में असमर्थ है, इसलिए स्कूल परिसर में मोबाइल टावर लगाया जाए। यह अनोखा जवाब ग्रामीण स्कूलों में खराब नेटवर्क कनेक्टिविटी की वास्तविक समस्या को उजागर करता है, जहां शिक्षकों को हाजिरी लगाने के लिए अक्सर ऊंचाई वाली जगहों की तलाश करनी पड़ती है। कई अन्य शिक्षकों ने भी स्कूल में मोबाइल नेटवर्क नहीं होने को अपने बचाव का मुख्य तर्क बताया है।
विरोध के मुख्य कारण
शिक्षकों के विरोध के पीछे केवल नेटवर्क की समस्या ही नहीं है, बल्कि कई अन्य गंभीर मुद्दे भी हैं:
नेटवर्क कनेक्टिविटी का अभाव: मध्य प्रदेश के लगभग 80% स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, जहाँ 4G कवरेज बहुत कम है। जियो-टैगिंग और चेहरा स्कैनिंग पर आधारित इस ऐप के लिए मजबूत इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता होती है, जो इन क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं है।
निजता का हनन: शिक्षकों का तर्क है कि उन्हें सरकारी नहीं, बल्कि अपने निजी मोबाइल फोन से यह उपस्थिति लगानी पड़ती है। उनका मानना है कि थर्ड-पार्टी ऐप के माध्यम से निजी फोटो, वीडियो और डेटा साझा होने से उनकी निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है और साइबर फ्रॉड का खतरा बढ़ जाता है। एक महिला शिक्षिका ने तो इसी आधार पर शो कॉज नोटिस का जवाब भी दिया है।
सुविधाओं की कमी: नियमित शिक्षकों के साथ-साथ अतिथि शिक्षकों को भी ई-अटेंडेंस लगानी पड़ रही है। अतिथि शिक्षक संघ का कहना है कि जब उनसे नियमित शिक्षकों जैसे सारे कार्य और ई-अटेंडेंस ली जा रही है, तो उन्हें भी समान वेतनमान, पदनाम और अवकाश जैसी सुविधाएं दी जाएं। कई शिक्षकों के पास अच्छे स्मार्टफोन नहीं हैं, और उन्हें हर महीने डेटा पैक का खर्च भी खुद उठाना पड़ रहा है।
दबाव और धमकी: शिक्षकों ने आरोप लगाया है कि जो शिक्षक ऐप से उपस्थिति दर्ज नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें विभाग के उच्च अधिकारी वेतन रोकने की धमकी देकर ऐप का उपयोग करने के लिए बाध्य कर रहे हैं। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद विभाग ने सख्त निर्देश दिए हैं कि इस महीने से ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं की गई तो वेतन में कटौती होगी, जिसने शिक्षकों पर और दबाव बढ़ा दिया है।
मामला पहुंचा हाई कोर्ट
ई-अटेंडेंस की इस नीति के खिलाफ प्रदेश भर के 27 शिक्षकों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं ने नेटवर्क और स्मार्टफोन जैसी समस्याओं को उठाते हुए ऐप के अनिवार्य उपयोग को चुनौती दी है। हाई कोर्ट की एकलपीठ ने दलीलों को सुनने के बाद सरकार और याचिकाकर्ताओं, दोनों से इस मुद्दे पर हलफनामा पेश करने को कहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि तकनीकी कारणों से किन-किन दिनों में अटेंडेंस नहीं लग सकी।
विभाग का रुख और शिक्षकों का अभियान
लोक शिक्षण संचालनालय के निदेशक केके द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि ऐप में कोई समस्या नहीं है और इस माह का वेतन ऑनलाइन उपस्थिति के आधार पर ही दिया जाएगा। विभाग ने जिला शिक्षा अधिकारियों को सख्ती से आदेश का पालन कराने और मॉनिटरिंग करने के निर्देश दिए हैं।
हालांकि, विभाग की सख्ती के बावजूद 52 प्रतिशत शिक्षक और 51 प्रतिशत प्राचार्य ही ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। शिक्षकों ने अब ई-अटेंडेंस ऐप का विरोध तेज कर दिया है और एक 'ऐप डिलीट अभियान' शुरू कर दिया गया है। शिक्षकों की मांग है कि या तो बायोमेट्रिक मशीन लगाई जाए या फिर पहले की तरह रजिस्टर में ही हाजिरी दर्ज करने की व्यवस्था बहाल की जाए। उनका कहना है कि यह व्यवस्था शिक्षण के पेशे में अंतर्निहित विश्वास को कम करती है और शिक्षकों को राष्ट्र निर्माता के बजाय 'चोर' या 'मक्कार' समझती है।
कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश में ई-अटेंडेंस का मुद्दा तकनीक बनाम जमीनी हकीकत, और प्रशासन बनाम निजता के अधिकार की लड़ाई बन गया है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों को पर्याप्त तकनीकी सुविधाएं, खासकर मजबूत मोबाइल नेटवर्क, उपलब्ध नहीं कराए जाते, यह विरोध जारी रहने की संभावना है।
