संचार साथी ऐप विवाद: क्या आप इसे डिलीट कर सकते हैं? विपक्ष के 'जासूसी' के आरोप के बाद केंद्र की बड़ी सफाई
सरकार ने स्पष्ट किया कि 'संचार साथी ऐप' को उपयोगकर्ता द्वारा डिलीट किया जा सकता है और इसे रखना या न रखना पूरी तरह से उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है। यह स्पष्टीकरण मोबाइल हैंडसेट में ऐप के अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन पर विपक्षी दलों द्वारा निजता (प्राइवेसी) और 'जासूसी' के गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद आया।
Tue, 2 Dec 2025
विवाद का जन्म और केंद्र का स्पष्टीकरण हाल ही में, भारत सरकार के संचार मंत्रालय के दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा मोबाइल हैंडसेट निर्माताओं को एक निर्देश जारी करने के बाद एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था। इस निर्देश में कहा गया था कि भारत में बेचे जाने वाले सभी मोबाइल फोनों में संचार साथी ऐप (Sanchar Saathi App) को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल (पहले से लोड) किया जाए। इस कदम का उद्देश्य "साइबर सुरक्षा को मजबूत करना और आईएमईआई (IMEI) के दुरुपयोग पर अंकुश लगाना" बताया गया था।
हालांकि, सरकार के इस निर्देश के तुरंत बाद ही विपक्षी दलों ने इस पर गंभीर चिंताएं व्यक्त करते हुए इसे नागरिकों की निजता के अधिकार पर सीधा हमला करार दिया। विपक्षी नेताओं ने इस ऐप की तुलना कुख्यात पेगासस (Pegasus) स्पाइवेयर से की और इसे एक "जासूसी ऐप" (Snooping App) कहकर संबोधित किया। इस राजनीतिक हंगामे के मद्देनज़र, केंद्र सरकार को मंगलवार को इस मामले में एक बड़ा स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा।
केंद्र सरकार ने यह साफ किया कि संचार साथी ऐप को उपयोगकर्ताओं द्वारा उनके मोबाइल फोन से डिलीट किया जा सकता है। सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका काम केवल "इस ऐप को सभी के सामने पेश करना" था।
केंद्रीय मंत्री का बयान
इस विवाद को शांत करने के लिए, केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक आधिकारिक बयान जारी किया। उन्होंने जोर देकर कहा, "अगर आप संचार साथी नहीं चाहते हैं, तो आप इसे डिलीट कर सकते हैं। यह ऐप वैकल्पिक (Optional) है... हमारा कर्तव्य है कि हम इस ऐप को सभी के सामने पेश करें। इसे अपने डिवाइस में रखना है या नहीं, यह पूरी तरह से उपयोगकर्ता पर निर्भर करता है।" मंत्री के इस बयान ने सरकार की मंशा को स्पष्ट करने का प्रयास किया और अनिवार्य प्री-इंस्टॉलेशन से पैदा हुए भय को दूर करने की कोशिश की।
विपक्ष के गंभीर आरोप
सरकार के इस निर्देश पर विपक्ष की प्रतिक्रिया काफी तीखी और आक्रामक रही। कांग्रेस पार्टी की नेता प्रियंका गांधी ने इस कदम को "तानाशाही" (dictatorship) करार दिया। उन्होंने कहा, "यह एक जासूसी ऐप है। यह हास्यास्पद है। नागरिकों को निजता का अधिकार है। परिवार, दोस्तों को संदेश भेजने के लिए हर किसी को निजता का अधिकार होना चाहिए, बिना सरकार के सब कुछ देखे... वे इस देश को हर रूप में तानाशाही में बदल रहे हैं।" प्रियंका गांधी ने स्पष्ट रूप से यह आरोप लगाया कि सरकार की मंशा नागरिकों की निगरानी करने की है, जिससे देश में लोकतंत्र खतरे में पड़ रहा है।
एक अन्य विपक्षी नेता शशि थरूर ने भी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए, हालांकि उन्होंने कहा कि ऐप्स उपयोगी हो सकते हैं, "बशर्ते वे स्वैच्छिक (voluntary) हों।" थरूर ने कहा कि "लोकतंत्र में किसी भी चीज़ को अनिवार्य बनाना परेशान करने वाला है।" उन्होंने सरकार से मांग की कि वह इस आदेश के पीछे के तर्क को जनता के सामने स्पष्ट करे, बजाय इसके कि मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से एक आदेश पारित कर दिया जाए। उनका मानना था कि इस मुद्दे पर सार्वजनिक चर्चा आवश्यक है ताकि आम जनता को पता चले कि सरकार की सोच क्या है।
ऐप का वास्तविक उद्देश्य
इस पूरे विवाद के बीच, दूरसंचार विभाग (DoT) ने संचार साथी ऐप की वास्तविक प्रकृति और उद्देश्य को दोहराया। DoT के अनुसार, संचार साथी ऐप एक "नागरिक केंद्रित पहल" (Citizen Centric Initiative) है, जिसे मोबाइल ग्राहकों को सशक्त बनाने, उनकी सुरक्षा को मजबूत करने और नागरिक केंद्रित पहलों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
मुख्य रूप से, यह ऐप मोबाइल उपभोक्ताओं को उनके नाम पर जारी किए गए मोबाइल कनेक्शनों को जानने, फ्रॉड कॉल से सुरक्षा प्राप्त करने और खोए या चोरी हुए मोबाइल फोन को ब्लॉक/ट्रैक करने जैसी सुविधाएँ प्रदान करता है। यह आईएमईआई नंबर के दुरुपयोग को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो साइबर अपराधों को रोकने में मदद करता है।
