सफेद आफत' ने छीना किसानों का निवाला: ओलावृष्टि से गेहूं और अफीम की फसलें बर्बाद, देखें ग्राउंड रिपोर्ट

अचानक आए मौसम बदलाव ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। ओलावृष्टि से गेहूं और अफीम की फसल को भारी नुकसान पहुँचा है। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
 
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भारत के कई राज्यों में मौसम के बदलते मिजाज ने किसानों की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। अचानक आई आंधी-तूफान और भारी ओलावृष्टि (Hailstorm) ने खेतों में खड़ी और खलिहानों में रखी फसलों को भारी नुकसान पहुँचाया है। विशेषकर मालवा-निमाड़ और राजस्थान के कुछ हिस्सों में गेहूं, सरसों और अफीम की खेती को सबसे ज्यादा चोट पहुँची है।

​गेहूं की फसल: दाना काला पड़ने और फसल बिछने का डर

​मार्च-अप्रैल का समय गेहूं की कटाई का होता है। इस समय फसल पूरी तरह पक कर तैयार होती है। ओलावृष्टि के कारण:

​फसल का बिछना: तेज आंधी से गेहूं के पौधे जमीन पर गिर गए हैं, जिससे दाना सड़ने का खतरा बढ़ गया है।

​क्वालिटी में गिरावट: नमी के कारण दाना काला पड़ सकता है, जिससे किसानों को मंडी में सही दाम नहीं मिलेगा।

​अफीम की खेती: सबसे ज्यादा संवेदनशील नुकसान

​अफीम की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय 'लुआई-चिरई' (अफीम निकालने की प्रक्रिया) का होता है।

​दूध का बहना: ओले गिरने और बारिश होने से डोडे (Capsule) से निकलने वाला अफीम का दूध बह गया है।

​काली मस्सी का खतरा: अधिक नमी से अफीम के पौधों में फंगस और बीमारियां लगने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पूरी मेहनत मिट्टी में मिल जाती है।

​सरकारी मुआवजे की आस

​किसानों ने अब सरकार से गिरदावरी (फसल नुकसान का सर्वे) कराकर उचित मुआवजे की मांग की है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौसम जल्द नहीं सुधरा, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पड़ेगा।

विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: बेमौसम ओलावृष्टि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर संकट

​प्रभावित क्षेत्रों का विस्तृत विवरण

​यह मौसमी सिस्टम मुख्य रूप से मध्य भारत और उत्तर-पश्चिम भारत के कृषि बेल्ट को प्रभावित कर रहा है।

​मध्य प्रदेश (मालवा-निमाड़): मंदसौर, नीमच, रतलाम और उज्जैन जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यहाँ अफीम के पट्टे सबसे अधिक हैं, जहाँ ओलों ने डोडों को सीधे नुकसान पहुँचाया है।

​राजस्थान (मेवाड़ और हाड़ौती): चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ और कोटा के इलाकों में गेहूं और सरसों की तैयार फसल आंधी के कारण जमीन पर बिछ गई है।

​उत्तर प्रदेश और हरियाणा: यहाँ कुछ हिस्सों में तेज हवाओं के साथ बारिश ने गेहूं की चमक (Luster) कम कर दी है।

​फसलों पर पड़ने वाला तकनीकी और आर्थिक प्रभाव

​1. अफीम (Opium): 'काला सोना' हुआ मिट्टी

​अफीम की फसल में इस वक्त 'चिरई' का काम चल रहा होता है।

​वैज्ञानिक कारण: ओले गिरने से डोडे फट जाते हैं। अगर डोडा फट जाए या बारिश का पानी उस पर लग जाए, तो उससे निकलने वाला 'मर्फिन' युक्त दूध बह जाता है।

​आर्थिक चोट: अफीम की खेती का लाइसेंस (पट्टा) अफीम की औसत मात्रा पर निर्भर करता है। यदि किसान औसत नहीं दे पाता, तो उसका पट्टा कटने का डर रहता है।

​2. गेहूं (Wheat): उत्पादन और गुणवत्ता की मार

​लॉजिंग (Lodging): जब तेज हवा के साथ बारिश होती है, तो गेहूं के भारी दाने वाले पौधे वजन नहीं सह पाते और गिर जाते हैं। इसे 'लॉजिंग' कहते हैं। इससे दाना छोटा रह जाता है।

​फंगल इन्फेक्शन: नमी बढ़ने से गेहूं के दाने काले पड़ सकते हैं, जिसे मंडी में 'डिस्कलरेशन' कहा जाता है। ऐसे गेहूं की एमएसपी (MSP) पर खरीद में भी दिक्कत आती है।

​मुआवजा प्रक्रिया: किसान क्या करें? (Step-by-Step Guide)

​सरकार द्वारा फसल नुकसान की भरपाई के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) और राजस्व विभाग की गिरदावरी दो मुख्य माध्यम हैं।

चरण प्रक्रिया का नाम विवरण

01 सूचना देना (72 घंटे) ओलावृष्टि के 72 घंटे के भीतर किसान को बीमा कंपनी या टोल-फ्री नंबर पर सूचना देनी अनिवार्य है।

02 क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट पटवारी और कृषि विभाग की टीम खेत पर आकर नुकसान का पंचनामा बनाएगी।

03 दस्तावेज़ आधार कार्ड, बैंक पासबुक, खसरा-खतौनी और फसल बुआई का प्रमाण पत्र तैयार रखें।

04 बीमा क्लेम सर्वे रिपोर्ट के आधार पर नुकसान का प्रतिशत तय होगा और राशि सीधे बैंक खाते में आएगी।

अफीम किसानों के लिए विशेष मांग

​अफीम किसान संगठनों ने सरकार से मांग की है कि:

​औसत में छूट: ओलावृष्टि को 'दैवीय आपदा' मानकर अफीम की अनिवार्य औसत (Average) की शर्त में ढील दी जाए।

​पट्टा सुरक्षा: जिन किसानों की फसल 50% से ज्यादा बर्बाद हुई है, उनके पट्टे अगले साल के लिए सुरक्षित रखे जाएं।

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