MP में विरोध करना पड़ा भारी: एक साथ गई 5 हजार कर्मचारियों की नौकरी

फेस आधारित उपस्थिति प्रणाली का विरोध करने वालों पर विभाग की बड़ी कार्रवाई, पारदर्शिता और अनुशासन पर जोर
 
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मध्य प्रदेश में सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के लिए लागू की गई फेस आधारित उपस्थिति प्रणाली (Face-Based Attendance System) अब कई कर्मचारियों के लिए मुश्किल बन गई है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने इस व्यवस्था का विरोध करने वाले पांच हजार से अधिक कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया है।
विभाग के अनुसार, यह कार्रवाई उन कर्मचारियों के खिलाफ की गई है जो आधार सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली (AEBAS) में लगातार गैरहाजिर पाए गए थे। विभाग का कहना है कि पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए यह कदम आवश्यक था।
विभाग की सख्ती, विरोध करने वालों पर गिरी गाज
सूत्रों के मुताबिक, कई नगर निकायों में कर्मचारी फेस आधारित हाजिरी प्रणाली का विरोध कर रहे थे। इन कर्मचारियों का कहना था कि सिस्टम तकनीकी रूप से कमजोर है और कई बार गलत उपस्थिति दिखाता है। बावजूद इसके, विभाग ने साफ कर दिया था कि सभी को नई व्यवस्था के तहत उपस्थिति दर्ज करनी होगी।
विभाग ने चेतावनी के बाद भी अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारियों की रिपोर्ट मांगी और जांच में पाए गए 5,000 से अधिक कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दीं।
सरकार का तर्क — पारदर्शिता और अनुशासन ज़रूरी
नगरीय विकास विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि नई तकनीक से घोस्ट एम्प्लॉयी (काल्पनिक कर्मचारियों) की समस्या खत्म होगी और वेतन वितरण में पारदर्शिता बढ़ेगी। सरकार का लक्ष्य है कि हर कर्मचारी की उपस्थिति का सटीक रिकॉर्ड रखा जा सके, ताकि कार्यकुशलता में सुधार हो।
कर्मचारी संघों में नाराजगी, आंदोलन की चेतावनी
वहीं, कर्मचारियों के संघों ने इस कार्रवाई को एकतरफा बताया है। उनका कहना है कि तकनीकी खामियों के कारण कई कर्मचारी गलत तरीके से गैरहाजिर दिखा दिए गए। संघों ने चेतावनी दी है कि यदि विभाग ने निर्णय वापस नहीं लिया तो राज्यभर में विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।
अब पूरे प्रदेश में निगरानी होगी सख्त
विभाग ने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में यह प्रणाली सभी नगर निगम, पालिका और परिषदों में पूरी तरह लागू की जाएगी। साथ ही, सिस्टम से जुड़े डेटा की नियमित मॉनिटरिंग भी की जाएगी, ताकि कोई भी कर्मचारी बिना उपस्थिति दर्ज किए वेतन न पा सके।
> यह कदम सरकार की “डिजिटल और पारदर्शी प्रशासन” नीति की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन विरोध के सुर बताते हैं कि जमीनी स्तर पर इसे लागू करना अभी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।

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