MP High Court Reservation in Promotion Case: पदोन्नति में आरक्षण पर सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण मामले की अंतिम सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। जानें क्या है पूरा विवाद और 7 लाख कर्मचारियों पर इसका क्या होगा असर।
 
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MP High Court में सुनवाई पूरी: फैसला सुरक्षित, लाखों कर्मचारियों को न्याय की उम्मीद

​जबलपुर। मध्य प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। पिछले करीब 9 वर्षों से लंबित 'पदोन्नति में आरक्षण' (Reservation in Promotion) मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपनी अंतिम सुनवाई पूरी कर ली है। जस्टिस शील नागू और जस्टिस अमरनाथ केसरवानी की युगलपीठ ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित (Reserve) रख लिया है।

​इस फैसले के आने के बाद यह साफ हो जाएगा कि प्रदेश के करीब 7 लाख सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति का रास्ता कैसे और कब खुलेगा।

​क्या है पूरा मामला? (Background of the Case)

​मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण का विवाद साल 2002 के 'लोक सेवा (पदोन्नति) नियम' से जुड़ा है। इस नियम के तहत राज्य सरकार ने पदोन्नति में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था।

​2016 का हाई कोर्ट का फैसला: 30 अप्रैल 2016 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पदोन्नति नियम 2002 को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। कोर्ट का कहना था कि यह सुप्रीम कोर्ट के 'एम. नागराज' केस के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है।

​सुप्रीम कोर्ट में अपील: राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया, जिसके कारण प्रदेश में प्रमोशन पर पूरी तरह रोक लग गई।

​वापस हाई कोर्ट में सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट ने बाद में स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें अपने स्तर पर डेटा जुटाकर पदोन्नति दे सकती हैं, लेकिन तकनीकी कारणों से मामला फिर से हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए आया।

​सुनवाई के दौरान प्रमुख दलीलें

​अंतिम सुनवाई के दौरान, आरक्षित वर्ग के संगठनों (जैसे सपाक्स और अन्य) की ओर से तर्क दिया गया कि बिना 'क्वांटिफिएबल डेटा' (प्रमाणिक डेटा) जुटाए आरक्षण देना असंवैधानिक है। उन्होंने मांग की कि पदोन्नति केवल 'मेरिट' के आधार पर होनी चाहिए।

​वहीं, राज्य सरकार और आरक्षित वर्ग के वकीलों का कहना था कि प्रशासन में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण आवश्यक है। सरकार ने तर्क दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मानकों का पालन करने के लिए तैयार है।

​कर्मचारियों पर क्या असर पड़ा?

​प्रमोशन पर रोक लगने के कारण मध्य प्रदेश का प्रशासनिक ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ है:

​रिटायरमेंट: पिछले 8-9 वर्षों में करीब 70,000 से ज्यादा कर्मचारी बिना पदोन्नति पाए ही रिटायर हो गए।

​प्रभारी राज: कई विभागों में कनिष्ठ अधिकारी (Juniors) वरिष्ठ पदों का प्रभार संभाल रहे हैं।

​आर्थिक नुकसान: समय पर पदोन्नति न मिलने से कर्मचारियों को आर्थिक और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है।

​आगे क्या होगा?

​अब सभी की नजरें हाई कोर्ट के लिखित आदेश पर टिकी हैं। यदि हाई कोर्ट सरकार के नए प्रस्तावों को हरी झंडी दे देता है, तो विभागवार वरिष्ठता सूची (Seniority List) अपडेट की जाएगी और रुकी हुई पदोन्नतियाँ शुरू हो सकेंगी। हालांकि, यदि फैसला फिर से किसी कानूनी पेंच में फंसता है, तो कर्मचारियों का इंतजार और लंबा हो सकता है।

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