मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय में स्पष्ट तौर पर कहा है कि आधार कार्ड और वोटर पहचान पत्र (Voter ID Card) को जन्मतिथि का निर्णायक या अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता — खासकर सेवा-संबंधी मामलों में। यह फैसला सेवा कानून, प्रशासनिक स्थिरता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के बड़े सवालों को सामने लाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद धार जिले के आंगनवाड़ी सहायिका (Helper) की नियुक्ति और सेवानिवृत्ति से जुड़ा है:
हिरलालबाई नामक महिला ने पहले सेवामुक्ति के बाद दावा किया कि उनकी जन्मतिथि गलत दर्ज की गई थी।
उन्होंने यह दावा आधार कार्ड और वोटर आईडी के आधार पर किया, जिन पर उनके अनुसार जन्मतिथि 1 जनवरी 1964 दर्ज थी।
इसी आधार पर एक अपीलीय अधिकारी ने 2020 में उन्हें पुनः बहाल किया और उनकी जगह नियुक्त प्रमिला को सेवा से हटा दिया।
प्रमिला ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की और उच्च न्यायालय ने यह पुनः बहाली और प्रमिला की हटाई गई सेवा दोनों को चुनौती दी।
हाईकोर्ट का मुख्य निर्णय
आधार कार्ड और वोटर आईडी जन्मतिथि का अंतिम प्रमाण नहीं
— न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने कहा कि ये दस्तावेज़ स्व-घोषणा पर आधारित होते हैं और केवल पहचान के लिए जारी किए जाते हैं, न कि जन्मतिथि की सटीकता तय करने के लिए। इन्हें सेवा मामले में निर्णायक साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सेवा अभिलेखों को अधिक महत्व
— कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड, जिन्हें नियुक्ति के समय दर्ज किया गया और पूरे करियर में स्वीकार किया गया, सबूत के रूप में अधिक विश्वसनीय होते हैं और परिवारिक दस्तावेज़ों से ज्यादा प्राथमिकता रखते हैं।
लापरवाही और देरी (Laches)
— हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी अपनी जन्मतिथि के बारे में शिकायत नहीं करता है जब वह सेवा में है या सेवानिवृत्ति के समय, तो बाद में किसी अप्रत्याशित देरी के साथ इस बात को उठाना उचित नहीं होता, जिससे प्रशासनिक अस्थिरता और तीसरे पक्ष को अप्रिय परिणाम हो सकते हैं।
नैतिक न्याय (Natural Justice) का पालन आवश्यक
— हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए — जैसे कि पक्षकार को सुनना — किसी आदेश को लागू करना न्यायिक रूप से मान्य नहीं रहता।
कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोण
⚖️ पहचान बनाम उम्र का प्रमाण
— आधार और वोटर कार्ड को भारत में सरकारी पहचान के लिए व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, लेकिन न्यायालयों ने बार-बार यह संकेत दिया है कि ये आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र (Birth Certificate) जैसे दस्तावेज़ की जगह नहीं ले सकते हैं, खासकर सीवा संबंधी विवादों में।
दस्तावेज़ों का महत्व
— हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब सेवा रिकॉर्ड (जैसे नियुक्ति पत्र, सेवा पुस्तिका आदि) समय पर दर्ज होते हैं और वर्षों से बिना विवाद के अपनाए जाते हैं, तो उन्हें जन्मतिथि तय करने के सबसे मजबूत प्रमाण के रूप में देखा जाता है। इसके विपरीत, बाद में जारी किए गए दस्तावेज़ जैसे आधार या वोटर कार्ड का दावा-समर्थन पर आधारित जन्मतिथि हमेशा निर्णायक नहीं मानी जा सकती। फैसले
सेवा मामलों में स्पष्ट मानक
— यह निर्णय सेवा विवादों में दस्तावेज़ीय प्रमाण की प्राथमिकता को स्पष्ट करता है और नौकरी/सेवानिवृत्ति आयु विवादों में आधार या वोटर कार्ड के महत्व को सीमित करता है।
नियोक्ता-कर्मचारी स्थिरता
— कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे मामलों को बिना देरी के और बिना ठोस साक्ष्य के वापस खोला जाना प्रशासनिक व्यवस्था और तीसरे पक्ष के अधिकारों के लिए घातक हो सकता है।
प्राकृतिक न्याय का पालन
— निर्णय ने यह भी रेखांकित किया कि प्रशासनिक आदेश में सभी पक्षों को समान अवसर देना आवश्यक है, अन्यथा आदेश को अवैध घोषित किया जा सकता है।