अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में 'ब्लैकमेल' और 'धमकी' जैसे शब्दों का प्रयोग कम ही होता है, लेकिन जब बात डोनाल्ड ट्रंप की हो, तो शब्दकोश बदल जाता है। हाल ही में ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी पुरानी इच्छा को टैरिफ (Tariff) की धमकी में बदलने वाले ट्रंप को यूरोपीय संघ (EU) ने दो टूक जवाब दिया है। यूरोप ने स्पष्ट कर दिया है कि वे 21वीं सदी में 'जमीन की खरीद-फरोख्त' वाली औपनिवेशिक मानसिकता को स्वीकार नहीं करेंगे।
विवाद की जड़: ग्रीनलैंड आखिर ट्रंप के निशाने पर क्यों?
ग्रीनलैंड, जो तकनीकी रूप से डेनमार्क का एक स्वायत्त हिस्सा है, अपनी रणनीतिक स्थिति और अकूत प्राकृतिक संसाधनों के कारण दुनिया की महाशक्तियों की नजर में है। ट्रंप इसे केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि एक 'बड़ी रियल एस्टेट डील' के रूप में देखते हैं।
खनिज संसाधन: यहाँ मौजूद दुर्लभ पृथ्वी तत्व (Rare Earth Elements) तकनीकी युद्ध में गेम-चेंजर हैं।
आर्कटिक मार्ग: जलवायु परिवर्तन के कारण पिघलती बर्फ ने नए समुद्री रास्तों को जन्म दिया है, जिस पर अमेरिका नियंत्रण चाहता है।
सैन्य महत्व: रूस और चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है।
ट्रंप की रणनीति: 'सौदा करो या टैरिफ झेलो'
ट्रंप ने हालिया बयानों में संकेत दिया है कि यदि डेनमार्क और यूरोपीय संघ ग्रीनलैंड के मुद्दे पर अमेरिका के साथ 'सहयोग' (बिक्री या पट्टा) नहीं करते हैं, तो उन्हें भारी व्यापारिक शुल्क का सामना करना पड़ सकता है। यह 'अमेरिका फर्स्ट' नीति का वह आक्रामक चेहरा है जो सहयोगियों को भी दुश्मन की तरह देखता है।
यूरोप का पलटवार: 'हम बिकाऊ नहीं हैं'
यूरोपीय संघ के प्रवक्ताओं और डेनमार्क के नेताओं ने इस बार अपनी भाषा में कोई नरमी नहीं दिखाई है। उनके जवाब के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
संप्रभुता सर्वोपरि: ग्रीनलैंड की जनता और वहां की सरकार अपनी नियति तय करने के लिए स्वतंत्र है।
आर्थिक युद्ध की तैयारी: यदि अमेरिका टैरिफ लगाता है, तो यूरोपीय संघ भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा: यूरोप ने साफ किया कि देशों को वस्तुओं की तरह खरीदा या बेचा नहीं जा सकता।