ग्रीनलैंड पर कब्जे की नई जंग? यूरोपीय सेना की तैनाती से अमेरिका और EU के बीच ठनी, जानिए क्या है पूरा विवाद

ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच तनाव बढ़ गया है। यूरोपीय सैनिकों की तैनाती और संसाधनों पर हक को लेकर जारी इस विवाद का वैश्विक असर क्या होगा? पढ़ें विस्तृत रिपोर्ट।
 
​ग्रीनलैंड भू-राजनीति ​आर्कटिक में सैन्य तनाव
बर्फ की चादर के नीचे सुलगती नई जंग
​दुनिया के सबसे बड़े द्वीप, ग्रीनलैंड की बर्फीली वादियों में इन दिनों शांति की जगह सामरिक हलचल ने ले ली है। हाल ही में यूरोपीय सैनिकों के ग्रीनलैंड पहुँचने की खबरों ने वैश्विक राजनीति में खलबली मचा दी है। यह कदम केवल एक सैन्य अभ्यास नहीं है, बल्कि यह उस गहरे मतभेद का प्रतीक है जो अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच ग्रीनलैंड के भविष्य और उसके विशाल प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर उभर रहा है।
​यूरोपीय सैनिकों का आगमन और उसका महत्व
​यूरोपीय संघ (EU) के प्रमुख देशों की सेनाओं का ग्रीनलैंड में उतरना एक स्पष्ट संकेत है कि ब्रुसेल्स अब इस क्षेत्र को केवल डेनमार्क का हिस्सा या अमेरिका का प्रभाव क्षेत्र मानकर शांत बैठने वाला नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार, इन सैनिकों की तैनाती का उद्देश्य आधिकारिक तौर पर क्षेत्र की सुरक्षा और निगरानी को मजबूत करना बताया गया है, लेकिन इसके पीछे की कूटनीति कहीं अधिक जटिल है।
​यूरोप का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं। इन मार्गों पर नियंत्रण और सुरक्षा के लिए यूरोपीय सेना की उपस्थिति अनिवार्य है। हालांकि, वाशिंगटन इस कदम को अपनी संप्रभुता और 'मोनरो सिद्धांत' (Monroe Doctrine) के आधुनिक संस्करण के लिए एक चुनौती के रूप में देख रहा है।
​अमेरिका की चिंता और असहमति का केंद्र
​अमेरिका और ग्रीनलैंड का रिश्ता दशकों पुराना है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिका ने ग्रीनलैंड में 'थुले एयर बेस' (अब पिटुफ़िक स्पेस बेस) के माध्यम से अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखी है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते हुए ग्रीनलैंड को खरीदने के प्रस्ताव ने दुनिया को चौंका दिया था, लेकिन जो बाइडन प्रशासन के तहत भी अमेरिका की नीति ग्रीनलैंड को अपने विशेष सुरक्षा दायरे में रखने की ही रही है।
​ताजा वार्ताओं में अमेरिका ने यूरोपीय सैनिकों की बढ़ती संख्या पर कड़ी आपत्ति जताई है। अमेरिका का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि केवल नाटो (NATO) के ढांचे के भीतर होनी चाहिए, न कि स्वतंत्र रूप से यूरोपीय संघ के नेतृत्व में। वाशिंगटन को डर है कि यूरोप की यह स्वतंत्र सैन्य पहल नाटो की एकता को कमजोर कर सकती है और रूस या चीन जैसे देशों को इस क्षेत्र में दखल देने का मौका दे सकती है।
​संसाधनों की होड़: दुर्लभ खनिज और भविष्य की ऊर्जा
​ग्रीनलैंड केवल बर्फ का ढेर नहीं है; यह भविष्य की तकनीक के लिए सोने की खान है। यहाँ 'रेयर अर्थ मेटल्स' (दुर्लभ खनिज), यूरेनियम, जस्ता और सोने के विशाल भंडार दबे हुए हैं। स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी और मिसाइल गाइडिंग सिस्टम तक, इन खनिजों की जरूरत हर जगह है।
​वर्तमान में चीन का इन खनिजों पर लगभग एकाधिकार है। ऐसे में यूरोप और अमेरिका दोनों ही अपनी निर्भरता चीन से कम करना चाहते हैं। विवाद इस बात पर है कि इन खनिजों के खनन का अधिकार किसके पास होगा और मुनाफे का बंटवारा कैसे होगा। यूरोपीय देश चाहते हैं कि ग्रीनलैंड के संसाधनों पर पहला हक यूरोपीय कंपनियों का हो, जबकि अमेरिका इसे अपनी 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का मुद्दा बनाकर नियंत्रण चाहता है।
​डेनमार्क की दुविधा: संप्रभुता बनाम सुरक्षा
​ग्रीनलैंड तकनीकी रूप से डेनमार्क के साम्राज्य का हिस्सा है, लेकिन इसे व्यापक स्वायत्तता प्राप्त है। डेनमार्क के लिए यह स्थिति "दो पाटों के बीच पिसने" जैसी है। एक तरफ वह यूरोपीय संघ का अभिन्न अंग है, तो दूसरी तरफ उसकी सुरक्षा पूरी तरह से अमेरिका और नाटो पर टिकी है।
​ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार (Naalakkersuisut) अपनी स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ा रही है। वे चाहते हैं कि उनके संसाधनों का लाभ उनके अपने लोगों को मिले। यूरोपीय सैनिकों की मौजूदगी को ग्रीनलैंड का एक धड़ा अपनी सुरक्षा के लिए अच्छा मानता है, जबकि दूसरा धड़ा इसे नई तरह का उपनिवेशवाद (Neo-colonialism) करार दे रहा है।
​आर्कटिक में बढ़ता सैन्यीकरण: एक नया शीत युद्ध?
​रूस ने पिछले कुछ वर्षों में आर्कटिक में अपने पुराने सोवियत सैन्य ठिकानों को फिर से सक्रिय किया है। चीन ने खुद को 'निकट-आर्कटिक देश' घोषित कर दिया है। ऐसी स्थिति में, अमेरिका और यूरोप के बीच का यह आंतरिक मतभेद पश्चिम की स्थिति को कमजोर कर सकता है।
​विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिका और यूरोपीय संघ ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर एक साझा जमीन नहीं तलाशी, तो यह क्षेत्र "नया दक्षिण चीन सागर" बन सकता है। यहाँ प्रतिस्पर्धा केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सैन्य भी होती जा रही है।
​वार्ता के मुख्य बिंदु: कहाँ फंसा है पेंच?
​हालिया बातचीत में कुछ प्रमुख बिंदुओं पर असहमति बनी रही:
​सैन्य कमान: यूरोपीय सैनिक किसके आदेश पर काम करेंगे? क्या वे नाटो के अधीन होंगे या सीधे ब्रुसेल्स को रिपोर्ट करेंगे?
​पर्यावरण मानक: यूरोप सख्त पर्यावरणीय नियमों के साथ खनन चाहता है, जबकि अमेरिका का जोर उत्पादन की गति पर है।
​चीन का निवेश: ग्रीनलैंड में चीनी निवेश को रोकने के लिए कौन कितनी आर्थिक मदद देगा, इस पर भी दोनों पक्ष एकमत नहीं हैं।
​ भविष्य की राह
​ग्रीनलैंड में यूरोपीय सैनिकों का पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि 21वीं सदी की भू-राजनीति अब केवल मध्य पूर्व या इंडो-पैसिफिक तक सीमित नहीं है। अब युद्ध की बिसात उस बर्फ पर बिछाई जा रही है जो सदियों से अछूती थी।

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